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Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || 13||

देहिनः-देहधारी की; अस्मिन्-इसमें; यथा-जैसे; देहे-शरीर में; कौमारम्-बाल्यावस्था; यौवनम्-यौवन; जरा-वृद्धावस्था; तथा समान रूप से; देह-अन्तर-दूसरा शरीर; प्राप्तिः -प्राप्त होती है; धीर:-बुद्धिमान व्यक्ति; तत्र-इस संबंध मे; न-मुह्यति–मोहित नहीं होते।

Translation

BG 2.13: जैसे देहधारी आत्मा इस शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था और वृद्धावस्था की ओर निरन्तर अग्रसर होती है, वैसे ही मृत्यु के समय आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है। बुद्धिमान मनुष्य ऐसे परिवर्तन से मोहित नहीं होते।

Commentary

श्रीकृष्ण सटीक तर्क के साथ आत्मा के एक जन्म से दूसरे जन्म में देहान्तरण के सिद्धान्त को समझाते हैं। वे यह समझा रहे हैं कि किसी भी मनुष्य के जीवन में उसका शरीर बाल्यावस्था से युवावस्था, प्रौढ़ता और बाद में वृद्धावस्था में परिवर्तित होता रहता है। आधुनिक विज्ञान भी यह कहता है कि हमारी शरीर की कोशिकाएँ पुनरूज्जीवित होती रहती हैं। पुरानी कोशिकाएँ जब नष्ट हो जाती हैं तो नयी कोशिकाएँ उनका स्थान ले लेती हैं। 

एक अनुमान के अनुसार सात वर्षों में हमारे शरीर की सभी कोशिकाएँ पूर्णतः परिवर्तित हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त कोशिकाओं के भीतर के अणु और अधिक शीघ्रता से परिवर्तित होते हैं। हमारे द्वारा ली जाने वाली प्रत्येक श्वास के साथ ऑक्सीजन के अणु हमारी कोशिकाओं में मिल जाते हैं और वे अणु जो अब तक हमारी कोशिकाओं में विद्यमान थे, वे कार्बन डाईआक्साइड के रूप में बाहर निकल जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार एक वर्ष के दौरान हमारे शरीर के लगभग 98 प्रतिशत अणु परिवर्तित होते हैं और फिर भी शरीर के क्रमिक विकास के पश्चात् हम स्वयं को वही व्यक्ति समझते हैं। क्योंकि हम भौतिक शरीर नहीं हैं अपितु इसमें दिव्य आत्मा निवास करती है।

 इस श्लोक में देहे का अर्थ 'शरीर' और देही का अर्थ 'शरीर का स्वामी' या आत्मा है। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह अवगत कराते हैं कि शरीर में केवल एक ही जन्म पर्यन्त परिर्वतन होता है जबकि आत्मा कई शरीरों में प्रवेश करती रहती है। साथ ही मृत्यु के समय यह दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। वास्तव में जिसे हम लौकिक शब्दों में मृत्यु कहते हैं, वह केवल आत्मा का अपने पुराने शरीर से अलग होना है और जिसे हम 'जन्म' कहते हैं, वह आत्मा का कहीं पर भी किसी नये शरीर में प्रविष्ट होना है। यही पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। आधुनिक युग के अधिकतर दर्शन भी पुनर्जन्म की धारणा को स्वीकार करते हैं। यह हिन्दू, जैन, और सिख धर्म का अभिन्न अंग है। बौद्ध ध म में महात्मा बुद्ध ने अपने पूर्वजन्मों की बार-बार चर्चा की है। अधिकतर लोग यह नहीं जानते हैं कि पुनर्जन्म पाश्चात्य दर्शन की आस्था पद्धति का भी एक अंग था।

 प्राचीन काल में प्रमुख पाश्चात्य धर्मों और दार्शनिक समाज के प्रसिद्ध विचारक जैसे पाइथागोरस, प्लेटो, और सुकरात पुनर्जन्म की सत्यता को स्वीकार करते थे और इस संबंध में इनके विचार ओरफिसिजम, (रहस्यवाद) हरमिटिसिजम (एकान्तवास) नियोप्लेटोनिजम, (अध्यात्म विद्या) मैनीकिनिजम (मानीवाद) और नोस्टिसिजम (गूढ ज्ञानवाद) जैसे ग्रंथों में वर्णित हैं। अब्राह्मिक आस्था के प्रमुख तीन धर्मो में भी पुनर्जन्म की धारणा का समर्थन मिलता है। उदाहरण के रूप में यहूदी कब्बला का अध्ययन किया, केथर्स, और मुस्लिम का शिया संप्रदाय जैसे अलवी शिया और ड्रयूज सम्मिलित हैं। ईसाई पाश्चात्य धर्मो में जोसेफ्स, प्राचीन यहूदी इतिहासकार ने अपने लेखन में जिस भाषा का प्रयोग किया है उसमें उनके समय में प्रचलित मुहावरे किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म की अवधारणा के प्रमाण के रूप मे प्रतीत होते हैं। यहूदी कब्बला में 'गिलगुल नेशमोट' या 'रोलिंग आफॅ सोल' के आधार पर निश्चित रूप से पुनर्जन्म के विचार का वर्णन किया गया है। महान सूफी कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी ने इस प्रकार से लिखा है:

यदि मैं पत्थर के रूप में मरता और मैं पेड़ बन जाता 

यदि मैं पेड़-पौधों के रूप में मरता तो मैं पशु बन जाता 

यदि मैं पशु की योनि में मरता तो मनुष्य की योनि में जन्म लेता 

तो फिर मैं मरने से क्यों भयभीत होऊ 

मृत्यु के पश्चात कब मैंने निम्न योनि प्राप्त की?

यदि मैं मनुष्य के रूप में मरूंगा तो फिर मैं फरिश्ता बनूंगा 

प्राचीन काल में कई इसाई पुनर्जन्म की अवधारणा में विश्वास रखते थे। इसाई इतिहास से हमें ज्ञात होता है कि 325 ई. में नाईकिया नामक नगर की परिषद द्वारा पुनर्जन्म पर चर्चा करने के लिए धर्म सभा का आयोजन किया गया जिसे बाद में धर्म के विरुद्ध घोषित कर दिया गया था। इसमें अप्रत्यक्ष रूप से लोगों के जीवन में हस्तक्षेप करने हेतु चर्च के अधि कारों को बढ़ाने की घोषणा की गयी।

 इससे पहले पुनर्जन्म की धारणा को सामान्य रूप से स्वीकार किया जाता था। जीसस ने अप्रत्यक्ष रूप से इस सिद्धान्त को प्रमाणित करते हुए अपने शिष्यों को बताया कि जॉन पूर्वजन्म में पैगम्बर के रूप में अवतरित 'एलाइजा' था। (मैथ्यू 11.13-14, मैथ्यू 17.10.13) इसका ओल्ड टेस्टामेंट (मेलकाय 4.5) में भी उल्लेख मिलता है। ओरिजन, महान क्रिश्चियन पादरी ने घोषणा की थी-"सभी मनुष्य अपने पूर्वजन्मों के संस्कारों के अनुसार शरीर प्राप्त करते हैं।" सोलोमन की विजडम नामक पुस्तक में वर्णन है, "सुडौल शरीर और अंग के साथ जन्म लेना पूर्वजन्मों के गुणों और पुण्यों का ही पुरस्कार है।" (विजडम ऑफ सोलोमन 8:19-20)। 

साइबेरिया, वेस्ट अफ्रीका, नार्थ अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे विश्व के कई आदिवासी कबीलों में भी पुनर्जन्म में आस्था पायी जाती है। इससे आगे यदि और अधिक नवीन शताब्दियों और सभ्यताओं पर दृष्टि डाली जाए तो स्पिरिटिजम, थिओसोफीस्ट्स, रोजिकुरुजन और न्यू ऐज फेलोअर जैसे ग्रंथों द्वारा भी पुनर्जन्म की अवधारणा की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त आधुनिक शताब्दियों में वर्जिनिया विश्वविद्यालय के डा. इयान स्टीवेंसन और डा. जिम टकर द्वारा किए गए कार्यों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वैज्ञानिक क्षेत्र के मुख्य विश्वविद्यालयों में अभी तक पुनर्जन्म की अवधारणा पर गंभीरता से अध्ययन किया जा रहा है। 

पुनर्जन्म के मत को स्वीकार किए बिना दुःखों, अव्यवस्था और अपूर्णता के कारणों को ज्ञात करना अत्यंत कठिन है इसीलिए कई पाश्चात्य विचारकों ने इस सिद्धान्त में विश्वास किया। वर्जिल और ऑविड ने इस धर्म सिद्धान्त को स्वयं प्रत्यक्ष रूप से सम्मान दिया है। जर्मन दार्शनिक गेटे, फिचते, शैलींग, लैसिंग ने भी इसे स्वीकार किया है। आधुनिक समय के अन्य दार्शनिकों जैसे ह्यूम स्पेन्सर और मैक्स मूलर सभी ने पुनर्जन्म के धर्म सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की है। पाश्चात्य कवियों में से ब्राविंग, रोसेटी, टनिसन, और वर्डस्वर्थ की पुनर्जन्म में आस्था थी। 

श्रीकृष्ण पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि बुद्धिमान पुरूष कभी शोक नहीं करता। किन्तु वास्तविकता यह है कि हम सुख और दुःख दोनों का अनुभव करते हैं। इसके क्या कारण हैं? अगले श्लोक में भगवान इसी को स्पष्ट करते हैं।

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